एक बार पिता पुत्र दोनों को व्यापार के लिए विदेश जाना था । पिता ने अपने सभी कीमती सामान एक बक्से में भरे औरउसमें तीन ताले लगा दिए । पिता पुत्र से बोला कि हम दोनों को बाहर जाना है अत : इस बक्से को किसी विश्वासपात्र व्यक्ति के पास रख देना चाहिए । पुत्र ने अपने मित्र का नाम लेकर कहा कि उसके घर पर बक्सा रख देना चाहिए । इस पर पिता ने पुत्र से कहा कि तुम जाकर मित्र से पूछ आओ कि बक्सा वह रखने को तैयार है या नहीं ।
पुत्र मित्र के पास गया और बक्सा रखने के बारे में पूछा । मित्र प्रसन्नतापूर्वक बक्सा रखने को तैयार हो गया । पुत्र बक्से को अपने मित्र के यहाँ रख आया । फिर पिता पुत्र दोनों विदेश चले गये ।
कुछ दिनों पश्चात् जब दोनों वापस आये तो पिता ने पुत्र से कहा कि पुत्र ! वह बक्सा अपने मित्र के यहाँ से ले आओ । थोड़ी देर बाद गुस्से में तमतमाया हुआ पुत्र वापस आया
और बोला - पिताजी ! यदि आपको मेरे मित्र पर भरोसा न था तो बक्सा वहाँ क्यों रखवाया । आपने तो कहा था कि उसमें कीमती सामान है मगर उसमें तो कंकड़ - पत्थर भरे पड़े हैं ।
पिता शांति पूर्वक पुत्र की बातें सुनता रहा , फिर बोला - पुत्र ! कंकड़ पत्थर की बात तुम्हें कैसे पता चली । पुत्र ने कहा - मेरे मित्र ने बताया ।
पिता ने कहा - तुम्हारे मित्र को कैसे पता चला कि बक्से में कंकड़ पत्थर हैं । अवश्य ही उसने बक्सा खोला होगा और उसे बक्सा खोलने की क्या आवश्यकता थी । हे पुत्र ! अब तो तुम्हें समझ आया होगा कि तुम्हारा मित्र कैसा है । जब तुम अपने .मित्र से पूछने उसके घर गये थे तभी मैंने तुम्हारे मित्र को परखने के लिए बक्से में से कीमती सामान निकालकर उसमें कंकड़ पत्थर भर दिए थे ।
पुत्र की आंखें खुल गईं । उसने पिता से कहा - मुझे माफ कर दीजिये । मैंने पहले आपकी बात नहीं मानी और नुकसान उठाता रहा । अब मैं समझ गया कि केवल मीठी -2 बातें करने वाला मित्र सच्चा मित्र नहीं होता है ।
सिख : तो आप समझ गए होंगे की इस कहानी का सार क्या हे ? परख।
धन्यवाद ❤
जय हिन्द जय भारत।

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